- डीबीटी और लान्झा टेक की आधुनिक तकनीक का होगा उपयोग
इंडियन ऑयल और अमेरिकी कंपनी लान्झा टेक ने मिलकर वर्चुअल ग्लोबल मीट का आयोजन किया, जिसमें दोनों कंपनियों के साझा प्रोजेक्ट सर्कुलर इकोनॉमी विजन- सीओ 2 का सदुपयोग के बारे में बताया गया. यह प्रोजेक्ट भविष्य की उन संभावनाओं पर आधारित है, जिनमें कार्बन डाई ऑक्साइड एक समस्या की बजाय ईंधन के स्त्रोत के रूप में इस्तेमाल की जा सकेगी. पेट्रोलियम और नैचुरल गैस मंत्रालय के सचिव तरुण कपूर, बायो-टेक्नोलॉजी विभाग के सचिव डॉ. रेणु स्वरूप, इंडियन ऑयल के चेयरमैन एस.एम. वैद्य, लान्झा टेक के सीईओ डॉ. जेनिफर होल्मग्रेन और इंडियन ऑयल के डायरेक्टर डॉ. एस.एस.वी. रामकुमार इस मीट में शामिल हुए.
पत्रकारों से बात करते हुए पेट्रोलियम और नैचुरल गैस मंत्रालय के सचिव तरुण कपूर ने कहा, हम बायोफ्यूल के क्षेत्र में काफी गंभीरता से काम कर रहे हैं. यह इथेनॉल और बायोफ्यूल का जमाना है और इस क्षेत्र में कई नए अविष्कार हो रहे हैं. ऐसे समय में हम ऐसी तकनीक पर काम कर रहे हैं, जिसके जरिए सस्ता और टिकाऊ बायोडीजल बनाया जा सकेगा. डीबीटी-इंडियन ऑयल और लान्झा टेक मिलकर बेहतरीन अवसरों का निर्माण कर रहे हैं. उन्होंने इंडियन ऑयल रिसर्च और डेवलपमेंट सेंटर के महत्व पर भी बात की, जिसके जरिए ऐसी स्वदेशी तकनीक बनाई जा रही है, जो लगातार देश के ईको-फ्रैंडली भविष्य के निर्माण में मददगार साबित होगी.
इंडियन ऑयल के चेयरमैन एस.एम. वैद्य ने इस आधुनिक तकनीक के बारे में विस्तार से बात करते हुए कहा लान्झा टेक के सहयोग से बनाई गई तकनीक से कार्बन डाई ऑक्साइड को ईंधन में बदला जा सकेगा. इसके जरिए बायो डीजल और बहुमूल्य ओमेगा-3 फैटी एसिड का बहुतायत में निर्माण किया जा सकेगा. इस आधुनिक तकनीक से हम हानिकारक कार्बन डाई ऑक्साइड गैस को बहुमूल्य ईंधन में बदल सकेंगे और हमारा दोहरा फायदा होगा. इससे ग्रीन एनर्जी तक हमारी पहुंच बढ़ेगी और सभी को सस्ता ईंधन उपलब्ध हो सकेगा.
डीबीटी के सचिव डॉ. रेणु स्वरूप में इस मौके पर कहा डीबीटी-इंडियन ऑयल रिसर्च और डेवलपमेंट सेंटर की स्थापना करने पर हमें गर्व है. यह सेंटर तकनीकी रूप से सक्षम दो बहुत ही अच्छे समूहों का मेल कराता है. पिछले कुछ सालों में इस सेंटर ने कई बेहतरीन तकनीकों का अविष्कार कर उत्कृष्टता के नए पैमाने स्थापित किए हैं.
रिसर्च और डेवलपमेंट सेंटर के डायरेक्टर और डॉ. एस.एस.वी. रामकुमार ने कहा इस रिसर्च सेंटर में दुनिया का पहला संयुक्त पायलट प्लांट बनाया गया है, जो दो एरोबिक और एनोरोबिक बायोटेक प्रकियाओं का मेल कराता है. इसके साथ ही इस सेंटर ने लैब के एक्सपेरीमेंट को पायलट स्केल पर उतारने में सफलता पाई है. इन परिणामों ने तेल और गैस के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर नई ऊर्जा का संचार किया है.
लान्झा टेक और इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन-डीबीटी की टीम ने यह दर्शाया है कि हमारे ग्रह के लिए एक बड़ी समस्या मानी जाने वाली कार्बन डाई ऑक्साइड गैस को हाईड्रोजन गैस के साथ मिलाकर कई ऐसी उपयोगी चीजों का निर्माण किया जा सकता है, जो आम जीवन में हमारे काम आती हैं. इस प्रकिया में इस्तेमाल होने वाली हाइड्रोजन को फिर से इस्तेमाल किया जा सकता है. लान्जा टेक की सीईओ डॉ. जेनिफर हॉल्मग्रेन कहती हैं पहले हम कार्बन का एक बार ही उपयोग कर पाते थे, पर अब ऐसा नहीं है. जब हम इससे लगातार खाना, केमिकल और ईंधन बना सकते हैं तो हम इसे बर्बाद क्यों करेंगे. हम अब पीछे नहीं हट सकते हैं.
भारत में पिछले छह वर्षों में एक अत्याधुनिक कार्बन रीसाइक्लिंग तकनीक विकसित की गई है, जिसमें मुख्य रूप से दो चीजों का इस्तेमाल होता है. कार्बन डाई ऑक्साइड और हाईड्रोजन. इसके जरिए हम लगातार ईंधन, केमिकल और रोजमर्रा के लिए भोजन बना सकते हैं. बायो एनर्जी पर आधुनिक रिसर्च के लिए बनाया गया, डीबीटी-आईओसी सेंटर (भारत सरकार के जैव प्रौद्योगिकी विभाग और इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड द्वारा सह-पोषित एक इकाई) और अग्रिणी कार्बन रिसाइकलिंग कंपनी लान्झा टेक 2014 से इस प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं. शुरुआत में दोनों समूहों ने मिलकर कार्बन डाई ऑक्साइड से ओमेगा-3 फैटी एसिड का निर्माण किया था. साथ मिलकर दोनों समूहों ने दो अत्याधुनिक तकनीकों का अविष्कार किया है, जिनके जरिए सीओ2 को सीधे उपयोगी चीजों में बदला जा सकता है.
सीओ2 को उपयोगी चीजों में बदलने के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है। जैसे पेडों को सूर्य की रोशनी, बिजली या फिर हाइड्रोजन. पर्यावरण और लागत के नजरिए से बिजली या हाइड्रोजन के उपयोग का महत्व तभी है, जब इनके स्त्रोत पूरी तरह से दोबारा इस्तेमाल किए जा सकें. इसका मतलब है कि इस तकनीकि के जरिए ईंधन और अन्य जरूरी वस्तुओं के निर्माण की लागत लगातार कम होगी क्योंकि बिजली के दोबारा उपयोग की क्षमता लगातार बढ़ती जाएगी.
ग्रीन हाईड्रोजन के निर्माण में बहुत ही सस्ती अक्षय ऊर्जा का इस्तेमाल होता है. और इसमें किसी भी तरह के हानिकारक पदार्थ का उत्सर्जन नहीं होता है. यह हाईड्रोजन सीओ2 से उपयोगी चीजों के निर्माण में बहुत ही अहम रोल अदा करती है. भारत में लगातार सोलर पैनल लगाए जा रहे हैं और इनकी मदद से 2030 तक भारत अपनी अक्षय ऊर्जा के उत्पादन के लक्ष्य से आगे निकल जाएगा. जो कि कोयले से बनने वाली बिजली से कई गुना सस्ता होगा. इन्हीं वजहों से भारत इस सीओ2 प्लांट की स्थापना के लिए सबसे उपयुक्त जगह बन रहा है.
यह काम लान्झा टेक के मौजूदा अनुभवों के आधार पर किया जा रहा है, जिसने फैक्ट्रियों से निकलने वाले कचरे से उपयोगी ईंधन और उपभोक्ताओं को लिए जरूरी केमिकल बनाए हैं, जिसमें विमान का वेस्ट भी शामिल है.
डीबीटी-आईओसी लान्झा टेक पायलेट प्लांट के बारे में
डीबीटी-आईओसी सेंटर ने इंडियन ऑयल रिसर्च और डेवलपमेंट सेंटर में दुनिया की पहली पायलट सुविधा शुरू की है, जो हर दिन लगभग 10 किलो कार्बन डाई ऑक्साइड से उपयोगी ईंधन और केमिकल का निर्माण करेगी. इस तकनीकी को अमेरिका, ब्रिटेन, यूरोपियन यूनियन और जापान में भी स्वीकारा गया है और इन सभी जगहों पर इस तकनीकी को लेकर लगातार चर्चा हो रही है. इस अत्याधुनिक प्रक्रिया की खोज के लिए इंडियन ऑयल और लान्झा टेक को 2015 में पेट्रोफेड की तरफ से कंपनी ऑफ द ईयर के अवॉर्ड से भी नवाजा जा चुका है.
मौजूदा समय में ओमेगा-3 फैटी एसिड के निर्माण के लिए मछली के तेल का उपयोग होता है, जिसके लिए बड़ी संख्या में मछलियों की आवश्यकता होती है. इस वजह से जरूरत से ज्यादा मछलियों को मारा जा रहा है, जिसके कारण भोजन की समस्या हो सकती है और हमारी जैविक विविधता प्रभावित हो रही है. साल 2025 तक ओमेगा-3 फैटी एसिड से बने उत्पादों का बाजार हर साल 10 हजार टन (57 बिलियन डॉलर) होने की संभावना है. बाजार में ईस्टर कंपाउंड की कीमत 500 से 1200 से डॉलर के बीच है, जो इसकी शुद्धता पर निर्भर करती है.
तीसरी जनरेशन की अत्याधुनिक बायो-फ्यूल तकनीकि ने कार्बन डाई ऑक्साइड के पुनर्चक्रण की असीम संभावनाओं के नए द्वार खोल दिए हैं. आशा है कि इस तकनीकि के जरिए ऐसा मंच तैयार होगा, जिससे लगातार वाणिज्यिक स्तर पर सस्ते खाद्य पदार्थ और ईंधन का निर्माण हो सकेगा. इस शानदार तकनीकि की मदद से इंडियन ऑयल कार्बन डाई ऑक्साइड के उत्सर्जन में कमी और डीएचए, बायो डीजल जैसे बेशकीमती उत्पादों के निर्माण के मामले में अपने प्रतिद्वंदियों को काफी पीछे छोड़ देगी.
