बेस्ट ऑप्शन है फल्मि मेकिंग में करियर
- सभी को शाहरूख, अक्षय या रितिक ही बनना है.
- कोई नवाज, नसीर, बोमन, अनुराग, संजय, विजयराज, रोहित शेटटी, हंसल मेहता क्घ्यों नहीं बनना चाहता है?
भोपाल. महाराष्ट्र का दिल याने मुंबई. सपनों का शहर. इस शहर से जुड़ी फल्मिी सितारों की इतनी कहानियां है, कि लगता है इस शहर के अलावा देश में कुछ भी नहीं. कुछ सच्ची कुछ झुठी कहानियां. लेकिन इन कहानियों को सच मानने वाले भी कम नहीं है.
जब से सिनेमा आया है, तब से लोग इसके दीवाने बने हुए है. एक बात कॉमन है कि फल्मि या मूवी देखकर जो भी युवा और युवतियां इस क्षेत्र में आने का मन बनाते है, उनके मन में शाहरूख खान, अक्षय कुमार, रितिक रौशन, करीना खान, केटरीना कैफ बनने का ही सपना होता है. लेकिन अधिकांश एक एक सीड़ी चढ़कर उपर जाने के बजाय एक रात में सेन्सेशन बनने का ख्वाब देखते है. इसलिए शायद हताश होते है. जबकि यह जानना जरूरी है कि नवाजुद्दीन सिद्दीकी, नसीरुद्दीन शाह आदि ने रातों रात सफलता नहीं पाई है. इसलिये फिल्म मेकिंग को आप्शन में लें क्योंकि इसमें कई अवसर हैं जो मंजिल तक पहुंचा सकते हैं. कैसे एक पूरी फिल्म तैयार होती है, उसको बनाने के लिए कितने लोग काम करते है. इस फील्ड में करियर बनाने के लिए कोन से कोर्सेस करना जरूरी है, किस संस्घ्था में प्रवेश मिलने पर आप सीधे बॉलीवुड के दरवाजे पर पहुंच सकते हो यह जानना जरूरी है.
फिल्म मेकिंग के तीन अहम पार्ट होते है. प्री प्रोडक्शन, प्रोडक्शन और प्रोस्ट प्रोडक्घ्शन. एक फिल्म जो हम सिनेमाघर, टेलीविजन सेट या मोबाइल पर देखते है, वो तो सबसे पहले कागज पर बनती है. फिल्म का जोनर क्या है, जैसे फिल्म रोमेंटिक है, थ्रिलर है, ड्रामा है, एक्शन है, हारर है, सोशल मैसेजिंग वाली है आदि. ये फिल्म बनने के पहले तय हो जाता है. फिल्म को कोन डायरेक्ट कर रहा है, इसमें कौन से एक्टर है, एक्ट्रेस कौन है, कोन फिल्म में निवेश कर रहा है, कोई बड़ा स्टूडियो, जैसे यशराज, इरोज, वायाकॉम, फॉक्स, डिज्नी. फिर बजट तय होता है.
प्री प्राडक्शन
रॉ स्क्रिप्ट को जांचा जाता है कि इसमें कितना बजट आ सकता है. फिल्म की कहानी फाइनेंसर और डिस्ट्रीब्टयूटर को सुनाई जाती है. अगर निवेशक फिल्म की कहानी को ओके या हरीझंडी दे देता है, तब फिल्म पर काम शुरू होता है. स्क्रिप्ट राइटर का काम सबसे अहम होता है. वह निर्धारित बजट में कंप्लीट स्क्रिप्ट विथ स्क्रीनप्ले तैयार कर डायरेक्टर को सौंप देता है.
कई बार स्क्रीनप्ले और डायलॉग राइटिंग के लिए विशेषज्ञों को हायर किया जाता है, जो फिल्म के प्लेस और लोकेशन को ध्यान में रखते हुए डायलॉग लिखते है. स्क्रीनप्ले और डायलॉग डायरेक्टर को सौंप दिए जाते है. बजट, स्क्रिप्ट, डायलॉग, शूटिंग प्लेस, कॉस्टयूम डिजाइन, कास्टिंग, शूटिंग परमीशन, एक्टर-एक्ट्रेस की डेट, पेपर वर्क सहित कार्य प्री प्रोडक्घ्शन के अंतर्गत आता है
प्रोडक्शन
प्री प्रोडक्शन में जो पेपर वर्क किया जाता है, उसे रियल में शूट को ही प्रोडक्शन कहा जाता है. प्री प्रोडक्शन में जितना मजबूत पेपर वर्क किया जाता है, प्रोडक्शन के समय उतनी कम परेशानी आती है. प्रोडक्शन टीम में डायरेक्टर, असिस्टेंट डायरेक्टर, डायरेक्टर ऑफ फोटोग्राफी (डीओपी), कैमरामेन, ड्रेस डिजाइनर, सेट डिजाइनर, एक्टर, को एक्टर, फिल्म क्रू सहित सौ से डेढ़ सौ लोगों की टीम एक साथ काम करती है. स्क्रिप्ट के मुताबिक रियल लोकेशन पर एक-एक सीन शूट होता है, जिसमें एक्घ्टर, को-एक्टर अपने अपने डायलॉग बोलते है. क्राउड के सीन को भी फिल्माया जाता है.
पोस्ट प्रोडक्शन
इस तरह एक फिल्म शूट होती है, जो बाद में पोस्ट प्रोडक्शन के लिए भेजी जाती है. प्रोडक्शन के दौरान जितना भी शूट होता है, उसे एक-एक सीक्वेंस के हिसाब से जोड़ा जाता है. जिसे एडिटिंग कहा जाता है. एक तरह से पोस्ट प्रोडक्शन में ही फिल्म बनती है. इसमें एडिटिंग, डबिंग, कलर ग्रेडिंग की जाती है. ये सारे कार्य डायरेक्टर की देखरेख में होते है. वर्तमान में पोस्ट प्रोडक्शन के दौरान वीएफएक्स सबसे महत्घ्वपूर्ण कार्य बन गया है.
वीएफएक्स के लिए अलग से स्टूडियों और तकनीक के जानकार और क्रियेटिव लोगों की टीम बनाई जाती है. जो फिल्म के जोनर और उसकी स्क्रिप्ट और शूट के मुताबिक वीएफएक्स का निर्माण करती है. जब फिल्म की एडिटिंग पूरी हो जाती है, तो उसे कलर ग्रेडिंग के लिए डीआई स्टूडियो भेजा जाता है. कलर ग्रेडिंग के बाद फिल्म रिलीज के लिए तैयार हो जाती है.
डिस्ट्रीब्यूशन
जब भी किसी फिल्म को बनाया जाता है, तो यह तय किया जाता है कि उसके डिस्ट्रीब्यूटर कौन होंगे. उसे कहां-कहां रिलीज किया जायेगा. पूर्व में सिंगल थियेटर के अलावा अलग अलग क्षेत्रों के डिस्ट्रीब्यूटर को फिल्म को बेचा जाता था. जो अपने अपने क्षेत्रों में फिल्म को प्रदर्शित करने का काम करते थे. लेकिन जब से फिल्म मेकिंग में कार्पोरेट का दबदबा बढ़ा है, तब से बड़ी मल्टीप्लेक्स चेन ही डिस्ट्रीब्यूशन का काम भी संभाल रही है. पीवीआर, सिनेप्लेक्स, आईनॉक्स सहित कार्पोरेट फिल्म के शो तय कर देते है.
अनुमान के मुताबिक फिल्म की कमाई शो के हिसाब से तय हो जाती है. वहीं अब भी देश में हजारों सिंगल थियेटर है, वहां पर भी फिल्म रिलीज की जाती है, वितरक और निर्माता कंपनी या निर्माताओं के ग्रुप को इससे भी आय होती है.
डायरेक्टर
फिल्म का डायरेक्टर फिल्म की जान होता है. जैसे कितनी भी अच्छी स्क्रिप्ट और डायलॉग लिखे गए हो, लेकिन फिल्म को ठीक तरह से फिल्माया नहीं गया तो सब कचरा हो जाता है. आपने देखा होगा कि कोई फिल्म शुरू में उत्साह जगाती है, उसके डायलॉग पर लोग रिएक्ट करते है, लेकिन पता नहीं चलता कि फिल्मकहां शुरू हुई और कहां खत्म. इस तरह के फॉल्ट के लिए जिम्मेदार डायरेक्टर होता है. इसलिए डायरेक्टर को मल्टीटॉस्किंग होना चाहिये. उसे सभी विषयों या विद्याओं की जानकारी होना चाहिये. तभी वह फिल्म के साथ न्याय कर सकता है. वर्तमान में अनुराग कश्यप, हंसल मेहता, आनंद एल राय, राजकुमार हिरानी, करन जोहर, आदित्य चैपड़ा अपने काम में माहिर माने जाते है.
सफल डायरेक्टर बनने के लिए आप पहले किसी अच्छे संस्घ्थान से डायरेक्शन का कोर्स कर सकते है. कोर्स करने के बाद किसी डायरेक्टर के असिस्टेंट बनकर डायरेक्शन का काम सीख सकते है.
स्क्रिप्ट राइटर-
सबसे पहले एक बात ध्यान में रखे कि आपको किस्सागोई करना या कहानी लिखना, बताना अच्छा लगता है या नहीं. अगर आप लिखने में रूचि रखते है, तब आपके लिए स्क्रिप्ट राइटर बनना थोड़ा आसान हो जाता है. स्क्रिप्ट लिखने का एक तरीका या फार्मेट होता है. उसके मुताबिक ही लिखना होता है. स्क्रिप्ट राइटर बनने के लिए कई संस्घ्थान है.
प्रोडयूसर
फिल्म प्रोडयूसर बनने के लिए कुछ खास योग्यताओं की आवश्घ्यकता नहीं होती है. केवल फिल्म मेकिंग की साधारण समझ होना चाहिये. सबसे खास बात ये है कि फिल्म के लिए निवेशकों से अप्रोच करना आना चाहिये. अगर स्वयं के पास पैसा है, तो सीधे फिल्म में निवेश करके भी प्रोडयूसर बन सकते है. इसके अलावा कापोर्रेट में अच्छे संबंध में भी एक सफल प्रोडयूसर बनने में मदद करते है. कई एक्घ्टर, डायरेक्टर के साथ प्रोडयूसर की भमिका भी निभा रहे है.
एडिटर
किसी भी फिल्म को बनने में एडिटर का महत्घ्वपूर्ण कार्य होता है. रॉ फिल्म को सीक्वेंस की तरह जोड़कर बिना किसी रूकावट या फिल्म की गति को कम किए एडिट करना होता है. फेमस डायरेक्टर, स्क्रिप्ट राइटर राजु हिरानी पहले एडिटिंग का काम ही करते थे.
सिनेमेटोग्राफर
सिनेमेटोग्राफर एक तकनीकी कार्य होता है. सिनेमेटोग्राफर दृश्यों को जीवंत बना देता है. एक अच्घ्छा सिनेमेटोग्राफर फिल्म की कहानी के मुताबिक लाइट और कैमरे का इस्तेमाल करता है. फिल्म शूट होते समय जितने भी कैमरों से शूट होता है, सभी पर सिनेमेटोग्राफर का नियंत्रण रहता है.
बाहुबली फिल्म के बाद सिनेमेटोग्राफर को स्टार जैसा दर्जा मिलने के बाद युवाओं में सिनेमेटोग्राफर बनने की चाह जगी है. सिनेमोग्राफर में केरियर बनाने के लिए सिनेमेटोग्राफर का कोर्स कर सकते है.
डायरेक्टर ऑफ फोटोग्राफी (डीओपी) एक तरह से सिनेमेटोग्राफर ही होता है. डीओपी का काम होता है लाइट और कैमरे का नियंत्रण. हालांकि डीओपी के पास काम करने की एक पूरी टीम होती है, जिसका नियंत्रण डीओपी के पास होता है. यह तकनीक वाला काम है. इस काम को बिना अनुभव के नहीं किया जा सकता है. शूट के समय किस तरह की लाइट और लैंस की आवश्घ्यकता होगी, यह अनुभव के बाद भी सीखा जा सकता है.
कोरियोग्राफर
कोरियोग्राफर को स्टार जैसा दर्जा मिलने लगा है. टीवी शो पर कोरियोग्राफर को आमंत्रित किया जाता है. कोरियोग्राफर बनने के लिए डांस करने का जूनून होना चाहिये. कोरियोग्राफी डांस और संगीत का मिला जुला रूप है. एक कोरियोग्राफर तब ही सफल हो पाता है, जब वह संगीत के अनुरूप डांस स्टेप्स क्रियेट कर सकता है. संगीत की लय, धुन और ताल पर हाव भाव और भाव भंगिमा के साथ डांस स्टेप्स को कराने का काम कोरियोग्राफर का होता है. कोरियोग्राफर बनने के लिए नृत्य की सभी विधाओं की जानकारी के साथ संगीत की अच्छी समझ होना चाहिये. अच्छी फिजिक वाले युवा कोरियोग्राफर बन सकते है. क्योंकि कोरियोग्राफर मेहनत वाला काम है, पेशे में आने से पहले जागरूक रहना होगा.
कास्टिंग डायरेक्टर
जब कोई सीरियल या फिल्म बनती है, तो केरेक्टर कौन सा एक्टर या एक्ट्रेस करेगी, इस पर मंथन होता है. यहां आती है कि कास्टिंग डायरेक्घ्टर की भूमिका. कास्टिंग डायरेक्टर स्क्रिप्ट के मुताबिक कलाकारों का ऑडिशन या सरल भाषा में एक्टिंग स्किल्स की जांच परख करता है. ऑडिशन की सीडी डायरेक्टर या क्रियेटिव टीम को भेजी जाती है. डायरेक्टर कलाकारों का ऑडिशन देखकर कौन सा रोल किसे करना है, यह तय कर देता है. किसी कलाकार को आगे बढ़ाने में कास्टिंग डायरेक्टर बहुत बड़ी भूमिका निभाता है.
म्यूजिक डायरेक्टर
भारत में बिना म्यूजिक डायरेक्टर के हिन्दी, तमिल, तेलगु, भोजपुरी या किसी भी क्षेत्रीय भाषा में फिल्म् नहीं बन सकती है. संगीत में रूचि है, तो इस क्षेत्र में हाथ आजमाया जा सकता है. इस फील्ड में कांपिटिशिन भी अधिक है. संगीत के क्षेत्र में काम करने के लिए संगीत की सभी विद्याओं की जानकारी होना चाहिये. क्लासिकल हो या जैज या पॉप, रेप सभी की जानकारी होना चाहिये.
इन विद्याओं में भी हैं रोजगार के अच्छे अवसर
साउंड इफेक्ट आर्टिस्ट, स्पेशल इफेक्ट आर्टिस्ट, सीजीआई आर्टिस्ट, वीएफएक्स विजुअल इफेक्ट आर्टिस्ट, लोकेशन मैनेजर, कलर ग्रेडिंग, प्रोस्थेटिक मेकअप आर्टिस्ट, स्टन्टमेन, डबिंग मेन, आदि
फिल्म मेकिंग के लिए कोर्स
पीजी डिप्घ्लोमा इन एक्टिंग, एक्टिंग में सर्टिफिकेट कोर्स, पीजी डायरेक्शन एवं स्क्रिप्ट राइटिंग, डिप्लोमा इन सिनेमेटोग्राफी, डिप्लोमा इन कैमरा, इन लाइटिंग, डिप्लोमा इन साउंड रिकार्डिंग एवं इंजीनियरिंग, डिप्लोमा इन एडिटिंग, पीजी डिप्लोमा इन वीडियो प्रोडक्शन.
भारत के चुनिंदा एवं अच्छे फिल्म मेकिंग संस्घ्थान -
नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा दिल्ली, फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया, पुणे, सत्यजीत रे फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया, कोलकाता, चेन्नई फिल्म स्कूल, तमिलनाडु, एलवी प्रसाद फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट, चेनई, व्हिस्टलिंग वुड्स इंटरनॅशनल, मुम्बई, डिजिटल फिल्म एकेडमी, मुंबई, एशियन एकेडमी ऑफ फिल्म एंड टेलीविजन, नोयडा, क्राफ्ट फिल्म स्कूल, दिल्ली
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